Saturday, 30 July 2016

विषहरण  बाबा दूबे...
-अजीत कुमार सिंह
झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाले देवघर जिले के सारठ-मधुपुर मुख्यमार्ग स्थित बामनगामा गांव में ख्याति प्राप्त प्राचीन दूबे बाबा का मंदिर है। इस मंदिर की मान्यता है की जहरीले-से-जहरीले सांप के द्वारा काटे जाने के बाद भी कोई अगर सच्ची श्रद्धा से बाबा के प्रांगण में पहुंचता है तो वो बच जाता है।
बाबा दूबे की पूजा तो प्रतिदिन की जाती है लेकिन सोमवार का दिन भक्ती के लिहाज से और खास माना जाता है। हर सोमवार को यहां पर श्रद्धालुओं  का तांता लगता है। इस मार्ग से जो भी बस-कार आदि गुजरते हैं वो बाबा के सामने शीश झुकाकर ही आगे बढ़ते हैं।
बाबा दूबे की वार्षिक पूजा-
बाबा दूबे की वार्षिक पूजा बंगला श्रावण मास के तीसरे सोमवार या अंतिम सोमवार को होती है। इस दिन बाबा की विशेष पूजा की जाती है। सुबह तीन बजे से ही भक्तों का आना शुरू हो जाता है। इस दिन आस-पास के गांव वाले जब तक पूजा संपन्न नहीं हो जाती तब-तक दूध वाली चाय नहीं पीते हैं। सुबह-सुबह अपने-अपने गायों के दूध और अरवा चावल बाबा के प्रसाद के लिए मंदिर में चढ़ा आते हैं। इसी दूध और अरवा चावल से बाद में खीर बनता है तथा अरवा चावल और पकवान का भोग लगाया जाता है।  मान्यता है कि आज के दिन बाबा साक्षात प्रकट होते हैं और लोगों के कष्ट को हर लेते हैं। आज का दिन बाबा दूबे की विधिवत पूजा लगभग 11 बजे शुरू हो जाता है। पूजा के पहले पूरे प्रागंण को धोया जाता है। उसके बाद चटिया बाबा के दिशा-निर्देश के अनुसार पूजा आरंभ की जाती है। पूजा आरंभ के साथ ही "हर-हर बाबा दूबे" से सारा वातावरण गुंजायमान हो जाता है। बाबादूबे को दूध और लावा का भोग लगाया जाता है। किदवंतियां हैं कि दूबे बाबा साक्षात प्रकट होकर दूध और लावा का भोग लेते हैं।
चटिया बाबा को दूध से नहवाया जाता है। भक्त उस दूध को प्रसाद मानकर अपने ऊपर छिंड़कते हैं। इस प्रसाद को पाने के लिए भक्तों में होड़ मच जाती है। चटिया बाबा के नहाने के तदुपरांत ब्राह्मणों को बाबा के प्रसाद के रूप में शुद्ध मिट्टि के बर्तन में दूध पिलाया जाता है। ब्राह्मण भोजन के बाद चटिया बाबा के सामने दूबेबाबा का गीत- नहाये सिनाये दूबे धोतिया जे पलटनी... जब गाया जाता है तो रोम-रोम सिहर उठता है। लोग आस्था में डुब जाते हैं। चटिया बाबा में दूबेबाबा समाहित होते हैं। कहा जाता है कि इस समय चटिया बाबा जो आशीर्वाद देते हैं उसे देव वाणी समझा जाता है।
इसके बाद बकरे का संकल्प किया जाता है और बकरे की बलि दी जाती है। भक्त अपनी मनोकामना की पूर्ति के बाद बकरे की बलि देते हैं।
इस पूजा में अनुशासन का खास ध्यान रखा जाता है। भक्त बेहद अनुशासित रहते हैं क्योंकि यहां एक्शन और रिएक्शन साथ-साथ चलता है। लोगों को डर रहता है कि कहीं कोई चूक न हो जाये।
एक बार की घटना है कि बचपन में मुझे एक बिच्छू ने डंस लिया। मैं अपनी दादी को बताया कि दादी मुझे एक बिच्छू नें डंस लिया है तो दादी ने सोलह आना (1 रूपये को गांव में सोलह आना कहा जाता है) दी और बोली जाओ पैर हाथ धो लो, मन-ही-मन बाबा को प्रणाम कर लो। सोमवार को बाबा को सोलह आना चढ़ा देना और गलती मान लेना कुछ नहीं होगा। मैं तब बच्चा था मुझे उतना ज्ञान नहीं था सो मैंने उस पैसे से पास की दुकान से नमकीन वगैरह खरीद कर खा लिया जैसा कि बचपन में लोग करते हैं। चूंकि उस समय मुझे बिच्छू काटने से जहर नहीं लगता था लेकिन नमकीन खाने के बाद एकाएक जहर का असर ज्यादा होने लगा। दर्द और जलन के मारे मैं चिल्लाने लगा। रात-भर परेशान रहा। लगभर पूरा गांव इकट्ठा हो गया। जब दादी डांटने लगी तो मैं सच बोल दिया। सच सुनने के बाद पिताजी ने मुझे बहुत डांटा और बाबा दूबे को प्रणाम करने को कहा। चूंकि बाबा दूबे का मंदिर मेरे गांव में ही है। मैंने पिताजी और वहां के पूजारी के कथनानुसार प्रणाम किया। दूबे बाबा को दंडवत प्रणाम किया और माफी मांगी। पंडित जी ने बाबा का नीर दिया उसे ग्रहण किया तब जान-में-जान आयी। सच में बाबा तेरी महिमा अपरमपार है।
बाबादूबे के पास जो भी भक्त आस्था और विश्वास के साथ आता है, बाबा उसकी मुराद पूरी करते हैं। इसीलिए तो बाबा के सामने से जो भी बसें आदि पार होती हैं (चूंकि बाबादूबे का मंदिर सारठ मधुपुर मुख्य-मार्ग पर स्थित है) बाबा के सामने बिना शीश झुकाये आगे नहीं बढ़ते हैं। बाबा के प्रागंण में विशाल बरगद का पेड़ यहां कि इतिहास को दर्शाता है। करीब 500 मीटर में फैला यह वृक्ष अपनी भव्यता को चार चांद लगा देता है। लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि एक ही वृक्ष इतने बड़े भू-भाग में कैसे फैल सकता है?
जो एक बार बाबा दर्शन कर लेते हैं उसे बार-बार आने का मन करता है। पूरे साल भक्तों का तांता लगा रहता है। बाबा की महिमा का गुणगान करते लोग थकते नहीं हैं। इस दुःखहरण, विषहरण दूबे बाबा को बारम्बार प्रणाम।

!!दूबेबाबा की जय!!

Tuesday, 26 July 2016

जरा याद करो कुर्बानी...
-अजीत कुमार सिंह
कारगिल विजयदिवस पर विशेष
जरा याद करो कुर्बानी...गीत सुनते ही रोम-रोम में देशभक्ति का संचार हो जाता है। इसी गीत को गुनगुनाते हुए सीमा पर कितने जवान मातृभूमि की रक्षा करते-करते अपने प्राण को न्यौछावर कर देते हैं। आज का दिन हम भारतवासियों के लिए गौरव का दिन है। आज ही के दिन यानि 26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध में पाकिस्तान पर अधिकारिक रूप से विजय प्राप्त की थी।
आज से ठीक 17 साल पहले, ऑपरेशन विजय के तहत कारगिल में जमे पाकिस्तानी घुसपैठियों को भारतीय सेना ने खदेड़कर भारत से बाहर किया था। दुश्मनों पर मिली इसी जीत को हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज से ठीक 17 साल पहले जो बच्चा पैदा हुआ होगा वो आज अपने किशोरावस्था की दहलीज को पार कर रहा होगा। आज जब वो बच्चा अपने बड़े-बुजुर्गों  से  कारगिल विजय की गाथा को सुन रहा होगा तो गर्व से उसका सीना चौड़ा हो रहा होगा।
कारगिल का युद्ध कई मायनों में पूर्व में हुए युद्ध से अलग है क्योंकि हमारे सैनिकों ने जिन विषम परिस्थितियों में दुश्मनों का मुकाबला किया वो अकथनीय है। उन दुर्गम पहाड़ों में बिना भोजन-पानी के सप्ताह भर डटे रहना। एक तरफ दुश्मन गोले बरसा रहे थे तो दूसरी तरफ प्रकृति भी...उनके धैर्य की परीक्षा लेने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती थी। चोटी पर दुश्मन और सैनिकों के सामने पर्वत की खड़ी चुनौती। चहुंओर बर्फ ही बर्फ। खाने-पीने की सामग्री का अकाल...इन सब पर हमारी सेना ने हार नहीं मानी और असंभव को संभव कर दुनिया को चकित कर दिया। तभी दुनिया में हमारी सेना का साख बहुत ऊंची है।
03 मई 1999 को जब स्थानीय गड़ेरियों ने पाकिस्तानी घुसपैठ की सूचना हमारे जवानों की दी थी, उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि आगे चलकर इतना बड़ा भीषण युद्ध होगा। घुसपैठ की सूचना पर भारतीय सेना का गश्ती दल जब वहां पहुंचा तो उन आस्तीन के सांपों ने हमारे पांच सैनिकों को बंधक बना लिया और यातनाएं देकर मौत के घाट उतार दिया।  पाकिस्तान का मूल मकसद कश्मीर से लद्दाख से जोड़ने वाली एकमात्र सड़क एनएच-1 पर कब्जा करना था। इससे सियाचीन ग्लेशियर पर भारतीय उपस्थिति पर विपरीत असर पड़ता और उसे कश्मीर की विवादित सीमा के मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण करना भी था। एक जून को पाकिस्तान ने एनएच-1 पर बम बरसाने शुरू भी कर दिये थे। जब 6 जून को भारतीय सेना के द्वारा जोरदार जवाबी हमला किया गया तो पाकिस्तान के पांव उखड़ गये। 6 जून के बाद भारतीय सेना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और आगे बढ़ते गये। पहले बाल्टिक सेक्टर की दो अहम चौकियों पर कब्जा, फिर द्रास में तोलोलिंग पर कब्जा...और यह क्रम बढ़ता गया। अंत में हार मानकर 5 जुलाई  को पाकिस्तान ने अपनी सेना को वापस बुलाने की घोषणा कर दी।
सरकारी आंकड़े के अनुसार भारत के 527 जवान शहीद हो गए और करीब 1363 जवान घायल हुए। जवानों की इतनी बड़ी कुर्बानी को हम इतनी आसानी से भूल नहीं सकते। आज कश्मीर का मुद्दा सबसे ज्यादा हावी है। जिस कश्मीर की सुरक्षा में हमारे सैनिक दिन-रात डटे रहते हैं। उसी कश्मीर में जवानों पर पत्थर बरसाना बहुत ही निंदनीय है। 08 जुलाई को कुख्यात आंतकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर में हिंसा भड़क उठी। उसके बाद वहां कि विधि व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कर्फ्यू लगाना पड़ा। आज पाकिस्तान मानवता की दुहाई दे रहा है और बुरहान को शहीद का दर्जा देकर उसकी याद में ब्लैक डे भी मना रहा है। इससे ज्यादा बेर्शमी क्या हो सकती है कि जिस समय पाकिस्तान के एक स्कूल में सौ से ज्यादा बच्चो को मौत के घाट उतार दिये जाते हैं तब उन्हें मानवता याद नहीं आती है  और न ही आतंकियो के विरोधी में कोई ब्लैक डे मनाया जाता है।
कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के पराक्रम की अनेक गाथाएं है। इस युद्ध में हमारे जवानों ने साहस और शौर्य की वह मिशाल पेश की जो भावी पीढ़ी को प्रेरणा देती रहेगी। आज अगर हम देश की सरहद के बीच सुकून और सुरक्षित होने का अहसास कर पा रहे हैं तो वह हमारे सैनिकों की वजह से है। हर भारतीय के लिए विजय दिवस गर्व करने का दिन है। ऐसे में इस जंग में शहीद वीर सपूतों और उनके शौर्य को याद करना ही उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।



Saturday, 23 July 2016

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की निरूपम विभूति: चन्द्रशेखर आजाद
-अजीत कुमार सिंह
चन्द्रशेखर आजाद के जन्मदिवस पर विशेष
भारत की स्वतंत्रता के लिए न जाने कितने वीरों ने अपनी जान तक न्यौछावर कर दिया। उनमें से अनेक वीरों के नाम भी ज्ञात नहीं है। जिन वीरों के नाम ज्ञात भी है, उन्हें आज हम भूल जैसे गए हैं। उनके आदर्श से आज की युवा पीढ़ी अनजान है।इन विभूतियों के नाम केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित  रह गया है।
                  भारत का इतिहास रहा है कि यहाँ कई महापुरुष हुए, जिन्होंने देश की सेवा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। कई महापुरुषों ने भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए अपने प्राणो की आहुति दी।उन्ही में से एक वीर शहीद-ए-आजम "चन्द्रशेखर आजाद" भी हैं।जिन्होनें अंग्रेजी हुकूमत की नींद हराम कर दी थी।
चन्द्रशेखर अजाद का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गाँव में 23 जुलाई 1906 को हुआ था। आजाद के माता श्रीमति जागरानी देवी ने कभी सपनों में भी सोचा नहीं होगा कि आगे चलकर उनका लाल भारत का इतना बड़ा क्रांतिकारी बनेगा। आजाद के पिता श्री सीताराम तिवारी भीषण अकाल पड़ने के कारण अपने एक रिश्तेदार का सहारा लेकर "अलीराजपुर" रियासत के ग्राम भावरा में जा बसे थे। इस समय "भावरा" मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में पड़ता है। अंग्रेजी शासन मे पले बढ़े आजाद की रगों मे शुरू से ही अंग्रेजों के प्रति नफरत थी।
चन्द्रशेखर आजाद बचपन से दृढ़ निश्चयी थे।
एक बार आदिवासी गाँव भावरा के कुछ बच्चे मिलकर दीपावली की खुशियाँ मना रहे थे। किसी बालक के पास फुलझाड़ियां, किसी के पास पटाखे थे। बालक चन्द्रशेखर खड़े खड़े अपने साथियों को खुशियाँ मनाते देख रहे थे। जिस बालक के पास माचिस थी, वह माचिस निकालता और एक छोर को पकड़कर डरते डरते माचिस से रगड़ता और रंगीन रोशनी निकलती तो डरकर उसे जमीन पर फेंक देता। बालक चन्द्रशेखर से देखा नहीं गया, वह बोला - "तुम डर के मारे एक तीली जलाकर भी अपने हाथ में पकड़े नहीं रह सकते । मैं सारी तीलियों को एक साथ जलाकर उन्हें हाथ में पकड़े रह सकता हूँ"  जिस बालक के पास माचिस थी, उसने वह चन्द्रशेखर को दे दी और कहा - "जो  कुछ भी कहा है, वह करके दिखाओ तब जानूँ।" बालक चन्द्रशेखर ने माचिस की सारी तीलियाँ निकालकर अपने हाथों मे ले ली। उसने तीलियों की गड्डी माचिस से रगड़ दी। भक्क से सारी तीलियाँ जल उठी। वे तीलियाँ जलकर चन्द्रशेखर की हथेली को जलाने लगी। असह्य होने पर भी चन्द्रशेखर ने तीलियों को उस समय तक नही छोड़ा जब तक की उनकी रंगीन रौशनी समाप्त नही हो गई।
उक्त घटना से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि चन्द्रशेखर बचपन से ही कितने कठोर और दृढ़निश्चयी थें।
चन्द्रशेखर आजाद बड़े होकर संस्कृत सीखने बनारस जा पहुँचे। उनके फूफा पंडित शिवविनायक मिश्र बनारस में ही रहते थे, उनके द्वारा आजाद को कुछ सहारा मिला तथा संस्कृत विद्यापीठ में दाखिला लेकर संस्कृत अध्ययन करने लगे।
उन दिनों (1921) में बनारस में महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गए असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी। 1919 में हुए अमृतसर के जालियाँवाला बाग नरसंहार ने देश के युवकों को उद्वेलित कर दिया था। यह आग असहयोग आंदोलन मे ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सड़क पर उतर आये। असहयोग आंदोलन में चन्द्रशेखर ने भी सक्रिय योगदान किया। इस दौरान चन्द्रशेखर भी एक दिन धरना देते हुए पकड़े गये। उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने में पेश किया। जहां मजिस्ट्रेट ने चन्द्रशेखर से व्यक्तिगत जानकारी के बारे में सवाल पूछना शुरू किया-
"तुम्हारा नाम क्या है?"
"मेरा नाम आजाद है।"
"तुम्हारे पिताजी का नाम क्या है?"
"मेरे पिता का नाम स्वाधीन है।"
"तुम्हारा घर कहाँ है?
"मेरा घर जेलखाना है।"
मजिस्ट्रेट इन उत्तरों से चिढ़ गया और 15 बेंत मारने की सजा सुनायी। जल्लाद जितनी बार बेंत मारता चन्द्रशेखर हर बार "भारत माता की जय" बोलता। बालक चन्द्रशेखर की चमड़ी उधड़ गयी परंतु अंतिम तक वह "भारत माता की जय" बोलता रहा।
इस घटना के पश्चात बालक चन्द्रशेखर अब चन्द्रशेखर आजाद कहलाने लगा।
सन 1922 में गाँधी जी के द्वारा असहयोग आंदोलन को एकाएक बंद कर देने के कारण आजाद की विचारधारा मे बदलाव आ गया। और वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गये। तभी वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गये। आजाद क्रांतिकारी बनने के बाद सबसे पहले 1 अगस्त 1925 को चर्चित "काकोरी कांड" (लखनउ के निकट काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर लखनउ सवारी गाड़ी को रोककर उसमे रखा अंग्रेजी खजाना लूट लिया।) को अंजाम दिया। बाद मे एक एक करके सभी क्रांतिकारी पकड़े गए पर आजाद कभी भी पुलिस के हाथ नही आया।
इसके बाद 1927 में रामप्रसाद बिस्मिल के साथ मिलकर उत्तर भारत के सभी क्रांतिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" का गठन किया। चन्द्रशेखर इस दल के कमांडर थे। वे घूम घूम कर इस दल के कार्य को आगे बढ़ाते रहे। भगत सिंह व उनके साथियों ने लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सांडर्स को मार कर लिया। फिर दिल्ली एसेम्बली मंs बम धमाका भी किया। अंग्रेज आजाद को तो नही पकड़ पाये लेकिन बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसम्बर 1927 तथा उससे 2 दिन पूर्व राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी पर लटकाकर मार दिया।
4 क्रांतिकारियों को फाँसी और 16 को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आजाद ने उत्तर भारत के सभी क्रांतिकारियों को एकत्र कर फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया गया। सभी ने मिलकर एक नया लक्ष्य निर्धारित किया - "हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी वह फैसला है जीत या मौत"
दिल्ली एसेम्बली बम कांड मे आरोपित भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव को फाँसी की सजा सुनाये जाने पर आजाद काफी आहत हुए। वे उत्तर प्रदेश के हरदोई जेल में बंद गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद जाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिले । आजाद ने पं. नेहरू से आग्रह किया कि गाँधी जी पर लॉर्ड इरवीन से इन तीनों की फाँसी को उम्रकैद में बदलवाने का जोर डालें। नेहरूजी ने जब बात नही मानी तो आजाद ने नेहरूजी से काफी बहस भी की। इस पर नेहरूजी ने आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे भुनभुनाते हुए बाहर निकल गये।
अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखबीर से इन सब घटनाओं के बारे मे चर्चा कर ही रहे थे कि सीआईडी के एसएसपी नॉट बाबर ने भारी पुलिस बल के साथ अल्फ्रेड पार्क में बैठे चन्द्रशेखर आजाद को चारों ओर से घेर लिया। दोनो ओर से भयंकर गोलीबारी हुई। जब आजाद के पिस्तौल में शेष एक गोली बची तो उन्होने अंग्रेजो के हाथो गिरफ्तार होकर मरने की अपेक्षा स्वयं पर गोली चला दी, उन्होंने ने कहा था कि मेरा नाम आजाद है, मैं आजाद हूँ और आजाद ही रहूँगा। और इस परिकल्पना को  आखिरकार उन्होंने सिद्ध कर दिखाया तथा भारत माता का यह अनुपम लाल सदा सदा के लिए इस दुनियां से आजाद हो गया।
चन्द्रशेखर आजाद भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की निरूपम विभूति है। भारत की स्वतंत्रता के लिए उनका अनन्य देशप्रेम, अदम्य साहस, प्रशंसनीय चरित्रबल देश के युवाओं को शाश्वत आदर्श प्रेरणा प्रेम देता रहेगा। आजाद का राष्ट्रप्रेम वंदनीय है। इस वीर शिरोमणि को भारतीय समाज हमेशा याद करेगा।
जय हिन्द!                 जय भारत!!


Tuesday, 12 July 2016

आतंकियों के जनाजे में इतनी भीड़ क्यों...

          कुख्यात आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी एक बार फिर दहल उठा है। लगातार हिंसा और प्रदर्शन जारी है। कई लोंगो की जानें भी जा चुकी है। कई पुलिसकर्मी भी घायल हो गये। लेकिन सबसे  बड़ी बात यह है कि इन अलगाववादी को प्रश्रय देता कौन है? इसकी फंडिग करता कौन है? आखिर कश्मीर के लोगों को आतंकवादियों से इतनी सहानुभूति क्यों...? दक्षिणी कश्मीर के मौत के सौदागर कहे जाने वाले बुरहान वानी के जनाजे में इतनी भीड़ क्यो...? आखिर वहां के लोंगो को कब समझ आयेगा कि आतंकी उनकी भावनाओं का इस्तेमाल कर घाटी में अशांति फैलाना चाहते हैं। उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ आतंक फैलाना है। हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हमेशा रहेगा भी। यह बात जितना जल्दी वहां के लोंगो को समझ में आ जाये बेहतर होगा।
कश्मीर को लेकर दोहरी राजनीति भी वहां की समस्या का कारण है।  कश्मीर के अंदर सुरक्षा बलों के हाथ बंधे हैं। सीमा की तरह खुले नहीं हैं। अगर उनके हाथ बंधे न हो तो पत्थर चलाने वाले और पाकिस्तानी झंडे लहराने वाले चंद घंटे भी टिक न पाएं। सरकार को भी अपना रूख स्पष्ट कर देना चाहिए। हमारी सेना अपनी जान को खतरे में डालकर उस कुख्यात आतंकी को मार गिराया। इसकी सराहना करने के बजाय ये लोग आतंकियों के समर्थन में उल्टे सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसा रहे हैं। यह देखना बेहद दयनीय है कि कश्मीर के युवाओं का एक बड़ा वर्ग न केवल बुरहान वानी सरीखे आतंकी को अपना आदर्श मान रहा है, बल्कि आइएस और लश्कर-जैश सरीखे आतंकी संगठनों को अपना मददगार मानने लगा है।  उसके मौत के बाद उमड़ी भीड़ यह बता रही है कि घाटी की जनता किस हद तक अलगाववादी एवं पाकिस्तान परस्त तत्वों के बहकावे में आ चुकी है। जिस आतंकी के मारे जाने पर जश्न मनाना चाहिए वहां घाटी के लोग मातम मना रहे हैं।  आखिर क्या कारण है कि ये लोग आतंकियों को अपना आदर्श मानता है। बुरहान वानी हिजबुल मुजाइद्दीन का 10 लाख ईनामी आतंकी था कोई  न कोई फरिस्ता, जो ये लोग मातम मना रहे हैं।
22 वर्षीय बुरहान वानी एक आतंकवादी था जो दक्षिण कश्मीर में इधर तेजी के सक्रिय था। जिस कारण उसे पोस्टर ब्वॉय कहा जाने लगा था। कारण, कभी वह वीडियो जारी करता था जिसमें हथियार लिए सुरक्षा बलों का मजाक उड़ाता था। कभी सोशल मीडिया कर अपने फोटो पोस्ट करता था, दूसरे आतंकवादियों को गले लगाते हुए वीडियो पोस्ट करता था। वह अपनी तकरीरों से कम उम्र के युवाओं को आकर्षित करने लगा था। पिछले दिनों उसका एक वीडियो वायरल हुआ, इसमें उसने सैनिक कॉलोनी और कश्मीरी पंडितों के लिए अलग कॉलोनी बनाने पर हमले की धमकी दी थी। उसे पकड़ने या मारने की कोशिश काफी समय से चल रही थी। पिछले साल जंगल में मिलने जा रहे उसका भाई सुरक्षा बलों की गोली से मारा गया लेकिन बुरहान पकड़ में नहीं आ सका। बुरहान धीरे-धीरे कश्मीरी युवको के बीच रॉल मॉडल बनने लगा था। इससे पहले 80 के दशक में मकबूल भट्ट कश्मीर में एक आइकॉन थे, जिन्हें देखकर युवा चरमपंथ की ओर आकर्षित हुए थे।  
बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हमारे नेताओं की जिस तरह सधी प्रतिक्रिया आयी है। वो बेहद चिंतनीय है। इससे हमारी सेना का मनोबल गिरेगा। विडंबना देखिए कि नेता इसकी आलोचना करने की बजाय अप्रत्यक्ष रूप से आतंकियो को ही समर्थन कर रहे हैं। बुरहान वानी के मौत के बात जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को ट्वीट आया कि "कश्मीर के लोगों को शुक्रवार को एक नया आइकॉन मिला है... मेरी बात याद रखिये बुरहान अपनी कब्र से इतने लोंगो को आतंकवाद से जुड़ने के लिए प्रेरित कर देंगे कि वो जिंदा रहते हुए सोशल मीडिया के जरिए नहीं कर पाते" उमर के इस ट्वीट से क्या अर्थ निकाला जाय। उमर से यह पूछा जाना चाहिए कि वो किसके साथ हैं ? क्या वो बुरकान जैसे आतंकवादियों के समर्थन में हैं या विरोध में ? सुरक्षा बलों ने बुरकान को मारा वो सही कदम था या नहीं ? उमर ने तो ये बहुत आसानी के कह दिया कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए कभी बुरहान वानी के किसी सोशल मीडिया पोस्ट को आतंकवाद से जुड़ा नहीं पाया। तो उसके सिर पर 10 लाख का इनाम क्यों रखा गया था?
कश्मीर कि स्थिति जैसे पहले थी वैसे आज भी कायम है। जब तक इस मसले का राजनीतिक हल नहीं खोजा जाता और केंद्र सरकार राजनीतिक कोशिशें नहीं करती, तब तक मुझे नहीं लगता कि स्थिति बदेलेगी। कश्मीर को लेकर एक ठोस और दूरदर्शी रणनीति बनानी होगी। पूर्व में जो गलतियां हो चुकी है, उसको फिर से न दोहराया जाना चाहिए। कश्मीर की जनता को भरोसा में लेना होगा। तभी इसका स्थायी हल निकल पायेगा।