विषहरण
बाबा दूबे...
-अजीत कुमार सिंह
झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाले देवघर जिले के सारठ-मधुपुर
मुख्यमार्ग स्थित बामनगामा गांव में ख्याति प्राप्त प्राचीन दूबे बाबा का मंदिर
है। इस मंदिर की मान्यता है की जहरीले-से-जहरीले सांप के द्वारा काटे जाने के बाद भी
कोई अगर सच्ची श्रद्धा से बाबा के प्रांगण में पहुंचता है तो वो बच जाता है।
बाबा दूबे की पूजा तो प्रतिदिन की जाती है लेकिन सोमवार का दिन भक्ती के लिहाज
से और खास माना जाता है। हर सोमवार को यहां पर श्रद्धालुओं का तांता लगता है। इस मार्ग से जो भी बस-कार आदि
गुजरते हैं वो बाबा के सामने शीश झुकाकर ही आगे बढ़ते हैं।
बाबा दूबे की वार्षिक पूजा-
बाबा दूबे की वार्षिक पूजा बंगला श्रावण मास के तीसरे सोमवार या अंतिम सोमवार को
होती है। इस दिन बाबा की विशेष पूजा की जाती है। सुबह तीन बजे से ही भक्तों का आना
शुरू हो जाता है। इस दिन आस-पास के गांव वाले जब तक पूजा संपन्न नहीं हो जाती
तब-तक दूध वाली चाय नहीं पीते हैं। सुबह-सुबह अपने-अपने गायों के दूध और अरवा चावल
बाबा के प्रसाद के लिए मंदिर में चढ़ा आते हैं। इसी दूध और अरवा चावल से बाद में
खीर बनता है तथा अरवा चावल और पकवान का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि आज के दिन बाबा साक्षात प्रकट
होते हैं और लोगों के कष्ट को हर लेते हैं। आज का दिन बाबा दूबे की विधिवत पूजा
लगभग 11 बजे शुरू हो जाता है। पूजा के पहले पूरे प्रागंण को धोया जाता है। उसके
बाद चटिया बाबा के दिशा-निर्देश के अनुसार पूजा आरंभ की जाती है। पूजा आरंभ के साथ
ही "हर-हर बाबा दूबे" से सारा वातावरण गुंजायमान हो जाता है। बाबादूबे को दूध और
लावा का भोग लगाया जाता है। किदवंतियां हैं कि दूबे बाबा साक्षात प्रकट होकर दूध
और लावा का भोग लेते हैं।
चटिया बाबा को दूध से नहवाया जाता है। भक्त उस दूध को प्रसाद मानकर अपने ऊपर
छिंड़कते हैं। इस प्रसाद को पाने के लिए भक्तों में होड़ मच जाती है। चटिया बाबा
के नहाने के तदुपरांत ब्राह्मणों को बाबा के प्रसाद के रूप में शुद्ध मिट्टि के
बर्तन में दूध पिलाया जाता है। ब्राह्मण भोजन के बाद चटिया बाबा के सामने दूबेबाबा
का गीत- नहाये सिनाये दूबे धोतिया जे पलटनी... जब गाया
जाता है तो रोम-रोम सिहर उठता है। लोग आस्था में डुब जाते हैं। चटिया
बाबा में दूबेबाबा समाहित होते हैं। कहा जाता है कि इस समय चटिया बाबा जो आशीर्वाद
देते हैं उसे देव वाणी समझा जाता है।
इसके बाद बकरे का संकल्प किया जाता है और बकरे की बलि दी जाती है। भक्त अपनी
मनोकामना की पूर्ति के बाद बकरे की बलि देते हैं।
इस पूजा में अनुशासन का खास ध्यान रखा जाता है। भक्त बेहद अनुशासित रहते हैं
क्योंकि यहां एक्शन और रिएक्शन साथ-साथ चलता है। लोगों को डर रहता है कि कहीं कोई
चूक न हो जाये।
एक बार की घटना है कि बचपन में मुझे एक बिच्छू ने डंस लिया। मैं अपनी दादी को
बताया कि दादी मुझे एक बिच्छू नें डंस लिया है तो दादी ने सोलह आना (1 रूपये को
गांव में सोलह आना कहा जाता है) दी और बोली जाओ पैर हाथ धो लो, मन-ही-मन बाबा को
प्रणाम कर लो। सोमवार को बाबा को सोलह आना चढ़ा देना और गलती मान लेना कुछ नहीं
होगा। मैं तब बच्चा था मुझे उतना ज्ञान नहीं था सो मैंने उस पैसे से पास की दुकान
से नमकीन वगैरह खरीद कर खा लिया जैसा कि बचपन में लोग करते हैं। चूंकि उस समय मुझे
बिच्छू काटने से जहर नहीं लगता था लेकिन नमकीन खाने के बाद एकाएक जहर का असर
ज्यादा होने लगा। दर्द और जलन के मारे मैं चिल्लाने लगा। रात-भर परेशान रहा। लगभर
पूरा गांव इकट्ठा हो गया। जब दादी डांटने लगी तो मैं सच बोल दिया। सच सुनने के बाद
पिताजी ने मुझे बहुत डांटा और बाबा दूबे को प्रणाम करने को कहा। चूंकि बाबा दूबे
का मंदिर मेरे गांव में ही है। मैंने पिताजी और वहां के पूजारी के कथनानुसार
प्रणाम किया। दूबे बाबा को दंडवत प्रणाम किया और माफी मांगी। पंडित जी ने बाबा का
नीर दिया उसे ग्रहण किया तब जान-में-जान आयी। सच में बाबा तेरी महिमा अपरमपार है।
बाबादूबे के पास जो भी भक्त आस्था और विश्वास के साथ आता है, बाबा उसकी मुराद
पूरी करते हैं। इसीलिए तो बाबा के सामने से जो भी बसें आदि पार होती हैं (चूंकि बाबादूबे
का मंदिर सारठ मधुपुर मुख्य-मार्ग पर स्थित है) बाबा के सामने बिना शीश झुकाये आगे
नहीं बढ़ते हैं। बाबा के प्रागंण में विशाल बरगद का पेड़ यहां कि इतिहास को
दर्शाता है। करीब 500 मीटर में फैला यह वृक्ष अपनी भव्यता को चार चांद लगा देता
है। लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि एक ही वृक्ष इतने बड़े भू-भाग में कैसे फैल
सकता है?
जो एक बार बाबा दर्शन कर लेते हैं उसे बार-बार आने का मन करता है। पूरे साल भक्तों
का तांता लगा रहता है। बाबा की महिमा का गुणगान करते लोग थकते नहीं हैं। इस
दुःखहरण, विषहरण दूबे बाबा को बारम्बार प्रणाम।
!!दूबेबाबा की जय!!


