Tuesday, 12 July 2016

आतंकियों के जनाजे में इतनी भीड़ क्यों...

          कुख्यात आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी एक बार फिर दहल उठा है। लगातार हिंसा और प्रदर्शन जारी है। कई लोंगो की जानें भी जा चुकी है। कई पुलिसकर्मी भी घायल हो गये। लेकिन सबसे  बड़ी बात यह है कि इन अलगाववादी को प्रश्रय देता कौन है? इसकी फंडिग करता कौन है? आखिर कश्मीर के लोगों को आतंकवादियों से इतनी सहानुभूति क्यों...? दक्षिणी कश्मीर के मौत के सौदागर कहे जाने वाले बुरहान वानी के जनाजे में इतनी भीड़ क्यो...? आखिर वहां के लोंगो को कब समझ आयेगा कि आतंकी उनकी भावनाओं का इस्तेमाल कर घाटी में अशांति फैलाना चाहते हैं। उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ आतंक फैलाना है। हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हमेशा रहेगा भी। यह बात जितना जल्दी वहां के लोंगो को समझ में आ जाये बेहतर होगा।
कश्मीर को लेकर दोहरी राजनीति भी वहां की समस्या का कारण है।  कश्मीर के अंदर सुरक्षा बलों के हाथ बंधे हैं। सीमा की तरह खुले नहीं हैं। अगर उनके हाथ बंधे न हो तो पत्थर चलाने वाले और पाकिस्तानी झंडे लहराने वाले चंद घंटे भी टिक न पाएं। सरकार को भी अपना रूख स्पष्ट कर देना चाहिए। हमारी सेना अपनी जान को खतरे में डालकर उस कुख्यात आतंकी को मार गिराया। इसकी सराहना करने के बजाय ये लोग आतंकियों के समर्थन में उल्टे सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसा रहे हैं। यह देखना बेहद दयनीय है कि कश्मीर के युवाओं का एक बड़ा वर्ग न केवल बुरहान वानी सरीखे आतंकी को अपना आदर्श मान रहा है, बल्कि आइएस और लश्कर-जैश सरीखे आतंकी संगठनों को अपना मददगार मानने लगा है।  उसके मौत के बाद उमड़ी भीड़ यह बता रही है कि घाटी की जनता किस हद तक अलगाववादी एवं पाकिस्तान परस्त तत्वों के बहकावे में आ चुकी है। जिस आतंकी के मारे जाने पर जश्न मनाना चाहिए वहां घाटी के लोग मातम मना रहे हैं।  आखिर क्या कारण है कि ये लोग आतंकियों को अपना आदर्श मानता है। बुरहान वानी हिजबुल मुजाइद्दीन का 10 लाख ईनामी आतंकी था कोई  न कोई फरिस्ता, जो ये लोग मातम मना रहे हैं।
22 वर्षीय बुरहान वानी एक आतंकवादी था जो दक्षिण कश्मीर में इधर तेजी के सक्रिय था। जिस कारण उसे पोस्टर ब्वॉय कहा जाने लगा था। कारण, कभी वह वीडियो जारी करता था जिसमें हथियार लिए सुरक्षा बलों का मजाक उड़ाता था। कभी सोशल मीडिया कर अपने फोटो पोस्ट करता था, दूसरे आतंकवादियों को गले लगाते हुए वीडियो पोस्ट करता था। वह अपनी तकरीरों से कम उम्र के युवाओं को आकर्षित करने लगा था। पिछले दिनों उसका एक वीडियो वायरल हुआ, इसमें उसने सैनिक कॉलोनी और कश्मीरी पंडितों के लिए अलग कॉलोनी बनाने पर हमले की धमकी दी थी। उसे पकड़ने या मारने की कोशिश काफी समय से चल रही थी। पिछले साल जंगल में मिलने जा रहे उसका भाई सुरक्षा बलों की गोली से मारा गया लेकिन बुरहान पकड़ में नहीं आ सका। बुरहान धीरे-धीरे कश्मीरी युवको के बीच रॉल मॉडल बनने लगा था। इससे पहले 80 के दशक में मकबूल भट्ट कश्मीर में एक आइकॉन थे, जिन्हें देखकर युवा चरमपंथ की ओर आकर्षित हुए थे।  
बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हमारे नेताओं की जिस तरह सधी प्रतिक्रिया आयी है। वो बेहद चिंतनीय है। इससे हमारी सेना का मनोबल गिरेगा। विडंबना देखिए कि नेता इसकी आलोचना करने की बजाय अप्रत्यक्ष रूप से आतंकियो को ही समर्थन कर रहे हैं। बुरहान वानी के मौत के बात जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को ट्वीट आया कि "कश्मीर के लोगों को शुक्रवार को एक नया आइकॉन मिला है... मेरी बात याद रखिये बुरहान अपनी कब्र से इतने लोंगो को आतंकवाद से जुड़ने के लिए प्रेरित कर देंगे कि वो जिंदा रहते हुए सोशल मीडिया के जरिए नहीं कर पाते" उमर के इस ट्वीट से क्या अर्थ निकाला जाय। उमर से यह पूछा जाना चाहिए कि वो किसके साथ हैं ? क्या वो बुरकान जैसे आतंकवादियों के समर्थन में हैं या विरोध में ? सुरक्षा बलों ने बुरकान को मारा वो सही कदम था या नहीं ? उमर ने तो ये बहुत आसानी के कह दिया कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए कभी बुरहान वानी के किसी सोशल मीडिया पोस्ट को आतंकवाद से जुड़ा नहीं पाया। तो उसके सिर पर 10 लाख का इनाम क्यों रखा गया था?
कश्मीर कि स्थिति जैसे पहले थी वैसे आज भी कायम है। जब तक इस मसले का राजनीतिक हल नहीं खोजा जाता और केंद्र सरकार राजनीतिक कोशिशें नहीं करती, तब तक मुझे नहीं लगता कि स्थिति बदेलेगी। कश्मीर को लेकर एक ठोस और दूरदर्शी रणनीति बनानी होगी। पूर्व में जो गलतियां हो चुकी है, उसको फिर से न दोहराया जाना चाहिए। कश्मीर की जनता को भरोसा में लेना होगा। तभी इसका स्थायी हल निकल पायेगा।



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